सावन थम गया है- न चूड़ियां बोलती हैं, न बादल

एक दौर था जब सावन सिर्फ़ आसमान से नहीं, दिलों से भी बरसता था। कांच की हरी चूड़ियों में सजी बेटियां जब पीपल की साखों से झूलती थीं, तो झूलों की हरकत में मोहब्बत की धड़कन सुनाई देती थी। सावन एक ऋतु नहीं, एक रूहानी रवायत था- जिसमें बारिश इबादत बनकर गिरती थी, और मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू इश्क़ की पहली दस्तक होती थी।

मगर आज?

आज सावन है, पर वैसा नहीं।

आज बारिश है, पर बरसात नहीं।

आज चूड़ियां हैं, पर खनक नहीं।

आज झूले हैं, मगर बालकनी से बंधे, यादों की तस्वीरों में जड़े हुए।

सावन अब एक मौसम से ज़्यादा, एक माजी की तहरीर है- जिसे हम हर साल कैलेंडर पर तो देखते हैं, लेकिन महसूस नहीं कर पाते।

जब चूड़ियां तहज़ीब की ज़ुबान थीं

हरे कांच की चूड़ियां सिर्फ़ साज नहीं थीं- वो संस्कृति की नर्म-नाज़ुक सांसें थीं। उनके खनकने में इश्क़ के वादे होते थे, सावन की सरगम होती थी और लोकगीतों की वो रवानी होती थी जो पीढ़ियों को आपस में जोड़ती थी।

“झूला पड़ा नीम के नीचे, बलमवा आएं होरी…”

ये महज़ गीत नहीं, तहज़ीब के दस्तावेज़ थे।

मगर अब वो सिर्फ़ डिजिटल आर्काइव्स में दफ़्न हैं।

हमने सांस्कृतिक स्मृतियों को बटन के पीछे छिपा दिया है- क्लिक करके देखने लायक बना दिया है, महसूस करने लायक नहीं।

विकास के नाम पर क़ुदरत से रिश्ता टूट गया

हमने विकास के लिए पेड़ काट दिए- वो पेड़, जिन पर सावन उतरता था।

हमने झीलें पाटीं- जिनमें बादल अपना अक्स देखा करते थे।

हमने खेतों को सीमेंट के सैलाब में गुम कर दिया- जहां पहले मेहंदी की महक और मोहब्बत की मुरादें बोई जाती थीं।

अब हमारे बच्चे बारिश की परिभाषा किताबों में पढ़ते हैं- और झूले सिर्फ़ रील्स में देखते हैं।

अब चूड़ियां ऑनलाइन मिलती हैं- मगर वो साजन के इंतज़ार की नहीं, सेल की खनक होती हैं।

जब बादल भी ख़ामोश हो गए…

कभी बादल गरजते थे तो रूह कांपती थी- अब वो चुप हैं।

कभी वो बरसते थे तो धरती मुस्कुराती थी- अब वो उदास हैं।

क़ुदरत अब नाराज़ नहीं, मायूस है।

वो पूछती है: “कहां गए वो लोग जो हवाओं से बातें करते थे? जो हरियाली में मोहब्बत बोते थे? जो चूड़ियों की खनक से रिश्ते जोड़ते थे?”

और हम… सिर्फ़ आंकड़ों से जवाब देते हैं।

विकास दर, GDP, मानसून डाटा….मगर इनमें ना धड़कन है, ना दुआ।

लौटना होगा- उस सावन की ओर जो अब भी इन्तज़ार में है

अब भी वक़्त है…

चलिए लौटते हैं उस नीम की छांव के नीचे,

जहां झूले हवाओं से बात करते थे।

जहां बेटियां सावन की प्रतीक्षा में हरी चूड़ियां पहनती थीं- और वो सिर्फ़ रंग नहीं, रूह की पुकार होती थीं।

हमें फिर से बारिश को ‘रहमत’ समझना होगा, सिर्फ़ जल संसाधन नहीं।

हमें खेतों को फिर से उम्मीदों से सींचना होगा, सिर्फ़ रसायनों से नहीं। हमें बेटियों को वो सावन लौटाना होगा- जिसमें उनका इंतज़ार एक कविता बनकर बहता था, न कि एक फोन की नोटिफिकेशन।

हमें झीलों को सिर्फ़ जल संचयन के लिए नहीं, मोहब्बत की आईना-सरज़मीन के लिए बचाना होगा। जहां चांद उतरता था और साजन का नाम लहरों पर लिखा जाता था।

हमें क़ुदरत से फिर वही मोहब्बत करनी होगी- जो बे-हिसाब थी, बे-वक़्त थी और बेशर्त थी।

निष्कर्ष: अगर सावन चुप हो गया, तो समझिए तहज़ीब बेज़ुबान हो गई

जिस दिन आख़िरी सावन आएगा- वो बिना खनक, बिना बरसात, बिना गीतों के आएगा।

उस दिन कोई बच्ची पूछेगी:

“अम्मी, ये सावन क्या होता था?”

और हमारे पास… कोई जवाब नहीं होगा।

सिर्फ़ एक टूटा हुआ झूला होगा- जो किसी बालकनी में जंग खा रहा होगा।

एक चूड़ी होगी- जो अब बाज़ार में मिलती है, मगर रूह में नहीं खनकती।

और एक गीत- जो किसी फ़ोल्डर में नामुराद पड़ा होगा, किसी विरासत की चीख़ बनकर।

इसीलिए…

लौट आइए- क़ुदरत आपको पुकार रही है। हर सूखे खेत की दरार में, हर चुप बेटी की हथेली पर, हर बूंद की अधूरी सिसकी में।

उन्हीं सिसकियों को फिर से आवाज़ दीजिए।

उन्हीं आवाज़ों को फिर से तहज़ीब बनाइए।

क्योंकि सावन सिर्फ़ मौसम नहीं- हमारी संस्कृति की सांस है। और सांस को बचाना- सिर्फ़ ज़िम्मेदारी नहीं, इबादत भी है।

(जौवाद हसन स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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